Monday, April 29, 2019

"شعرت بالانتهاك عندما أرسل إلي أحدهم صورته عاريا"

كنت أتفحص هاتفي أثناء رحلة ذهابي إلى العمل، لأجد صورة لرجلٍ عارٍ تظهر على الشاشة. وشعرت بخجل وامتهان شديد، كما لو كنت أنا من تقف عارية.

وظهرت رسالة على شاشة هاتف آيفون الخاص بي، تسألني إن كنت أقبل أو أرفض استقبال الصورة العارية التي أرسلها رجل غريب عبر خاصية "إير دروب".

وكانت الصورة تشي بمجهود كبير في التقاطها وإعدادها. فقد غير في الإضاءة، وصنع خلفية مموهة، ونسّق جسده النحيل، ووقف أمام المرآة عاريا وقضيبه منتصب. وهو مجهود كبير في سبيل التقاط صورة بهدف إرسالها للغرباء.

رفضت استقبال الصورة على الفور. لكن هذا لم يمنع تسلسل الإحساس بعدم الأمان والخوف إليّ.

طالما ظننت أنني قوية بفعل الحركات النسوية المتنامية، وأنه بإمكاني مواجهة أي رجل أو أي إهانة أتعرض لها. لم أرد أن أجعله يهرب بفعلته، لذا خرجت من عربة المترو فور تعرفي على الرجل الذي يشبه من هاجمني بصورته العارية.

وكنت أتفقد الوجوه في عربة المترو من حولي، بينما أرسل هو صورته للمرة الثانية أثناء خروجنا من العربة.

ومشيت خلفه وأنا أفكر في الطريقة المثلى للتعامل مع الموقف. هل هو نفس الشخص؟ لديه نفس البنية ونفس الوجه، ونفس الذراعان النحيلان. لكن ماذا أقول له؟

وقفت خلفه على السلم المتحرك، ورأيت شاشة هاتفه وقد ظهرت عليها الصور وهو يحاول إرسالها عبر خاصية "إير دروب".

وعندما نظر إليّ، اختفى شعوري بالغضب، وانمحت من ذهني الكلمات التي أردت التعبير بها عن إحساسي بالإهانة. لم أستطع أن أنطق بكلمة أو أوبخه. شعرت بالخوف الشديد، وأقنعت نفسي أنه فهم قصدي من نظراتي الغاضبة.

لكن الحقيقة - رغم ظني أنني قوية - أن هذا الرجل حولني بصورته إلى شخص ضعيف، يشعر بالإهانة، ولا يقدر على الدفاع عن نفسه. ولازمني هذا الشعور طوال اليوم، وما زالت هذه الواقعة حاضرة في ذهني.

وبحثتُ عبر الإنترنت عن وقائع إرسال صور عارية في المترو، لأجد أن لها مصطلح هو "الوميض الإلكتروني". واكتشفت أن هذا الأمر يؤرق الكثيرين، إذ تسمح خاصية "إير دروب" بمشاركة الملفات والصور مع أجهزة آبل المحيطة بدون التعرف على رقم من أرسلها. وتظهر الصورة في شكل أيقونة صغيرة، مصحوبة برسالة تسأل المستقبل إن كان يقبل الاحتفاظ بالصورة.

وتحدثت نساء أخريات عن الأمر. ومن بينهن إما ويلسون، التي أبلغت الواقعة لشرطة النقل البريطانية. لكنها ما زالت غاضبة بعد مرور أشهر على الواقعة، إذ قال لها رجل الشرطة إنه من المستحيل التحقيق في هذا الأمر، وإنه ثمة الكثير من البلاغات والقليل من المعلومات عنها، وإنها "مجرد صور".

وكانت نصيحته لها أن تتأكد من إغلاق خاصية إير دروب طوال الوقت في الأماكن العامة.

وتقدم شركة آبل نفس النصيحة، إذ توجه المستخدمين لضرورة إغلاق خاصية إير دروب، أو قصرها على جهات الاتصال المسجلة في الهاتف.

ويقول مفتش التحقيق في شرطة النقل البريطانية، آشلي كوبر، إنهم يتلقون اثنين إلى ثلاثة بلاغات شهريا من أشخاص تعرضوا للوميض الإلكتروني. وكرر النصيحة الخاصة بضبط إعدادات الخصوصية.

لكن ريتشل كريس، المدير المشارك في تحالف إنهاء العنف ضد النساء، تقول إنه لا يجب أن يكون العبء على النساء.

وقالت: "لابد أن تتوقف الشرطة عن إخبار النساء بتغيير طريقة حياتهن بسبب احتمال انتهاك الرجال لخصوصيتهن."

كما تشعر إما ويلسون أن الحل لا يكمن في إغلاق خاصية مفيدة، وإنما في منع الرجال من إرسال مثل هذه الصور. "وأنا غاضبة لأننا نعيش في مجتمع يطالب النساء بالحذر والحيطة عند استخدام التكنولوجيا، خشية أن يستخدمها الرجال للتحرش بنا."

وتعمل الحكومة على اتخاذ إجراءات لحماية الناس من استقبال صور غير مرغوبة لأعضاء الرجال التناسلية عبر الهواتف الذكية.

كما قدمت لجنة النساء والمساواة في مجلس العموم البريطاني مقترح قانون "يركز على منع هذا التصرف، بحيث لا يكون التركيز على توجيه النساء بتغيير سلوكهن، وإنما بتقويم سلوك الرجال الذين يلجؤون لهذا السلوك العدواني."

لكن البعض، ومن بينهم كريس، يرون أن تجريم هذا التصرف ليس كافيا، وأنه لابد من وضع موانع في نظام التشغيل بحيث تضع شركات التكنولوجيا النساء في الحسبان عند تطوير مثل هذه التقنيات.

وحتى الآن، توجه شرطة النقل البريطانية المواطنين بضرورة الإبلاغ عن وقائع الوميض الإلكتروني فور حدوثها.

ويقول كوبر: "عادة ما تفلت هذه الوقائع من الإبلاغ بسبب استهانة الضحايا بالواقعة، أو لعدم معرفتهم بالجهة التي يجب عليهم التوجه إليها."

Friday, April 12, 2019

श्याम सरन नेगी: 1951 के पहले चुनाव का पहला वोटर

झुर्रियों से भरा चेहरा और कमज़ोर शरीर. छड़ी के बिना दो कदम चल भी नहीं सकते. कुछ कदम चलने के बाद उन्हें लंबी सांस लेनी पड़ती है. शिमला से करीब 280 किलोमीटर दूर किन्नौर ज़िले के ख़ूबसूरत से गांव कल्पा में लकड़ी के बने अपने घर में जब वह कुर्सी पर बैठते हैं तो उनके पीछे बर्फ़ से ढकी पहाड़ की चोटियां नजर आती हैं.

बातों का सिलसिला जब शुरू होता है तो वे उन सब बातों का ज़िक्र करते हैं जिसने उनके जीवन पर असर डाला है.

102 साल के श्याम सरन नेगी, अपनी उम्र और शारीरिक तक़लीफों के बावजूद एक बार फिर से लोकतंत्र के पर्व में भाग लेने को उत्साहित हैं. स्वतंत्र भारत के पहले मतदाता के तौर पर मशहूर नेगी को भारतीय लोकतंत्र का लीविंग लीजेंड भी कहा जाता है. उन्हें 19 मई का इंतजार है, जब किन्नौर सहित हिमाचल प्रदेश में चुनाव होना है. किन्नौर, मंडी संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है.

अपनी क्षीण आवाज़ में नेगी याद करते हैं, "अक्तूबर, 1951 में मैंने पहली बार संसदीय चुनाव में वोट डाला था, इसके बाद मैंने एक भी चुनाव मिस नहीं किया. मैं अपने वोट की अहमियत को जानता हूं. अब तो मेरा शरीर भी साथ नहीं दे रहा है, लेकिन आत्मशक्ति के चलते मैं वोट देने जाता रहा हूं. इस बार भी मताधिकार का इस्तेमाल करना है. हो सकता है कि ये मेरा आख़िरी चुनाव हो. यह उम्मीद है, जिसे मैं अपने जीवन के अंतिम चरण में छोड़ना नहीं चाहता."

जब हमलोग नेगी जी से मिलने पहुंचे उस वक्त वे चुनाव आयोग की ओर से भेजे गए बूथ अधिकारी (बीएलओ) और स्थानीय प्रशासन के लोगों से घिरे हुए थे और नींबू चाय पीते हुए स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव के मतदान वाले दिन से जुड़ी यादों को शेयर कर रहे थे.

नेगी कहते हैं, "हां, वो दिन मुझे पूरा याद है. वह मेरे जीवन का बड़ा दिन था." ऐसा कहते हुए उनके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है.

स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव के दौरान, किन्नौर में 25 अक्तूबर, 1951 को वोट डाले गए थे.

वैसे तो भारत में फ़रवरी-मार्च, 1952 में वोट डाले जाने थे लेकिन किन्नौर में जाड़ा और बर्फ़बारी की आशंका को देखते हुए कम से कम पांच महीने पहले चुनाव करा लिए गए थे.

नेगी उस वक्त पास के गांव मूरांग में स्कूली शिक्षक थे, लेकिन वे अपने गांव कल्पा (उस वक्त चिन्नी के नाम से जाना जाने वाला गांव) के वोटर थे.

नेगी बताते हैं, "मुझे अपने स्कूल में चुनाव कराना था. लेकिन मेरा वोट अपने गांव कल्पा में था. मैं एक रात पहले अपने घर आ गया था. सुबह जल्दी उठकर तैयार हो गया. सुबह छह बजे अपने पोलिंग बूथ पर गया."

"मैंने वहां पोलिंग कराने वाले दल का इंतज़ार किया, जब वे आए तो मैंने उनसे अनुरोध किया कि मुझे वोट डालने दें क्योंकि इसके बाद मुझे जाकर मूरंग में चुनाव कराना है जो आठ से दस किलोमीटर दूर था. उन लोगों ने मुझे निर्धारित समय से आधा घंटा पहले साढ़े छह बजे मुझे वोट डालने दिया."

इसके बाद से नेगी ने एक भी चुनाव मिस नहीं किया, चाहे वह पंचायत का चुनाव रहा हो या फिर राज्य विधानसभा का चुनाव हो या फिर संसदीय चुनाव हो. उनका पोलिंग बूथ नंबर कल्पा 51 है, जहां कुल 928 मतदाता हैं, जिनमें 467 महिलाएं शामिल हैं. यह बूथ नेगी के घर से महज दो किलोमीटर की दूरी पर है. हालांकि पहले उनका बूथ महज 50 मीटर की दूरी पर था. लेकिन अब नेगी अपने बेटे के साथ नए घर में रहते हैं, तो दूरी थोड़ी बढ़ गई है.

नेगी पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं, "मैं ने अपने वोट को कभी व्यर्थ नहीं किया. लेकिन इस बार मैं 102 साल का हो गया है, मेरा स्वास्थ्य भी ठीक नहीं है. उम्र के चलते मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पाता हूं. मेरे पांव लड़खड़ाने लगते हैं. मैं थक जाता हूं और चल नहीं पाता हूं. आंखों की रोशनी भी कम हो चुकी है. बावजूद इन सबके अगर तबीयत और ज़्यादा नहीं बिगड़ी तो मैं वोट देने जाऊंगा."

नेगी का जन्म पहली जुलाई, 1917 को हुआ था. वे भारत के सबसे बुर्जुग वोटर हैं. उन्हें कभी इसका एहसास नहीं था कि एक दिन युवा मतदाताओं को मोटिवेट करने के लिए उनका उदाहरण दिया जाएगा.

नेगी बताते हैं, "जब मेरे जैसा बुजुर्ग आदमी मतदान के दिन बूथ जा सकता है तो दूसरे क्यों नहीं जा सकते. निश्चित तौर पर, युवा मेरे जीवन से यह सीख ले सकते हैं."

2007 तक नेगी स्थानीय लोगों की तरह ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय, कल्पा में अपना वोट देने जाते रहे थे. लेकिन 2007 में चुनाव आयोग ने आयकन बन चुके मतदाताओं, ख़ासकर पहले चुनाव में मत डालने वाले मतदाताओं की पहचान का काम शुरू किया था.

नेगी पहले चुनाव में वोट डालने वाले मतदाताओं में थे और उसके बाद उन्होंने कोई भी चुनाव मिस नहीं किया था. चुनाव आयोग ने अपने आर्काइव के आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी की थी. राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव मनीषा नंदा इसकी पुष्टि करती हैं जो उस वक्त के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) थीं.

नेगी को बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने भी सम्मानित किया. चावला उनको सम्मानित करने खासतौर पर किन्नौर आए थे.

लीजेंड वोटर के तौर पर मान्यता मिलने पर नेगी बताते हैं, "मुझे बहुत अच्छा लगा. मुझ इस स्टेटस से प्यार भी है. इससे मेरा उत्साह बढ़ा. मुझे कई बार सम्मानित भी किया गया. इसके अलावा चुनाव आयोग हर मतदान के दिन मेरा स्वागत भी करती है. मैं स्कूलों में जाता हूं और बच्चों को मतदान के प्रति जागरूक करता हूं. अच्छा लगता है."

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले गूगन ने नेगी पर एक फ़िल्म बनाई थी- प्लेज टू वोट (Pledge To Vote). यह फिल्म इंटरनेट पर वायरल हुई थी, इसे फिल्मों के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन सहित तमाम दूसरे ब्रैंड एंबैसडरों ने भी देखा था.

नेगी यह बताते हैं कि उनकी यादाश्त कमजोर हो रही है, लेकिन भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी कुछ यादें हैं. महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री और सुभाष चंद्र बोस जैसे नेताओं के बारे में नेगी याद करते हैं.

नेगी कहते हैं, "उस वक्त हम कांग्रेस को वोट दिया करते थे. कांग्रेस की स्वतंत्रता आंदोलन में अहम भूमिका रही थी. लेकिन बाद में जब कांग्रेस भ्रष्टाचर में फंस गई और ग़रीबी दूर करने में नाकाम रही तो जनता पार्टी लोकप्रिय हो गई थी."

भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है? नेगी की नजरों में ग़रीबी और भूख भारत सरकार और खासकर कांग्रेस के लिए बड़ा धब्बा है. इसके अलावा नेगी बेरोज़गार के मुद्दे को बड़ा मानते हैं.

1975 से नेगी सेवानिवृत जीवन बिता रहे हैं और ज़्यादातर समय अपने कमरे में रेडियो सुनते हैं. वे कहते हैं, "जीवन काफी एकाकी हो गया है. कब तक चलेगा नहीं मालूम लेकिन इतना कुछ कर लिया है कि गरिमा के साथ विदा होऊंगा."

इतना ही नहीं, नेगी पुराने बैलेट सिस्टम की तुलना में ईवीएम की काफ़ी तारीफ करते हैं. वे कहते हैं, "यह बेहतर सिस्टम है. ईवीएम में उम्मीदवारों की तस्वीर होती है. जब आप बटन दबाते हैं तो बीप साउंड करता है जो बताता है कि आपका वोट डल गया."

नेगी के बेटे सीपी नेगी, फूलों का काम करते हैं. वे बताते हैं कि 2014 में उनकी मां के निधन के बाद से उनके पिता सामाजिक रूप से बहुत सक्रिय नहीं रहे.

उनके मुताबिक पिता सुबह आठ बजे के क़रीब उठते हैं और काफी अनुशासित जीवन जीते हैं. सुबह में योगा करते हैं और नाश्ता करने से पहले कुछ कसरत भी करते हैं.

नीतीश नो फैक्टर और कन्हैया से मेरी कोई तुलना नहींः तेजस्वी

बिहार में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, हम और वीआईपी का महागठबंधन लोकसभा के 40 सीटों पर भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए को सीधी टक्कर दे रहा है. दोनों तरफ़ के उम्मीदवारों की भी घोषणा हो चुकी है.

लेकिन गठबंधन राजनीति के दबाव और व्यक्तित्वों के टकराव की वजह से कई क्षेत्र में मुक़ाबला सीधा नहीं है.

सीपीआई-सीपीएम जैसे बड़े वाम दलों का महागठबंधन से बाहर रह जाना विपक्ष के लिए कुछ सीटों पर भारी पड़ सकता है. बेगूसराय में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, राजद के तनवीर हसन और सीपीआई के कन्हैया कुमार की उम्मीदवारी से न केवल संघर्ष त्रिकोणीय हुआ है बल्कि यह देश की हॉट सीट्स में शुमार हो गया है.

ये भी पढ़ेंःबिहार: लालू के MY से तेजस्वी के MUNIYA तक
ताज़ा परिदृश्य में राजद के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने बीबीसी से लंबी बातचीत की और अपने गठबंधन की जीत के लिए पूरी तरह आश्वस्त दिखे.

उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कोई फैक्टर मानने से इंकार किया. तेजस्वी को कन्हैया कुमार से अपनी तुलना भी पसंद नहीं है. प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश-

चर्चा है कि बेगूसराय से कन्हैया के जीतने से राजद नेतृत्व विशेषकर तेजस्वी की चमक राष्ट्रीय फलक पर मंद पड़ जाएगी. आपको क्या लगता है?

अभी कन्हैया कौन से पद पर हैं. वो जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं और तबसे वो इतने वोकल हो गए हैं. मतलब सांसद नहीं बनेंगे तो वो समाप्त हो जाएंगे क्या. ये बात समझने की ज़रूरत है. कुछ चर्चा हो इसलिए ऐसी बात विरोधी फैलाते हैं. आज तक बाल ठाकरे चुनाव लड़े थे क्या, मुख्यमंत्री रहे थे क्या, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में उनका गहरा प्रभाव था. ऐसे कई नेता हुए हैं जो परदे के पीछे रहे और उनका ग़ज़ब का फॉलोविंग भी रहा है. पद मिल जाने से कोई नेता नहीं हो जाता. मुझे नहीं पता कि मेरी उनसे तुलना क्यों कर रहे हैं. किस बात की तुलना जबकि उनसे मेरी कोई समानता नहीं है. हमारे और उनके काम करने में बहुत अंतर है.

बेगूसराय से सीपीआई से कन्हैया कुमार उम्मीदवार हैं. बीते दिनों ऐसा लग रहा था कि राजद उन्हें समर्थन कर सकता है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. क्यों?

कन्हैया के नाम की घोषणा महागठबंधन में सब कुछ तय हो जाने के बाद हुई थी. बेगूसराय सीट राजद की परंपरागत सीट रही है. यह सीट समाजवादियों का गढ़ रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद तनवीर साहब को क़रीब पौने चार लाख वोट मिले थे. बहुत कम अंतर से वो चुनाव हारे थे. इसके अलावा बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के प्रमंडल स्तर के कार्यकर्ताओं का दबाव था कि तनवीर हसन साहब को ही पार्टी उम्मीदवार बनाए. वो पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष भी हैं. उनमें कोई कमी हमें नज़र नहीं आती.

कन्हैया के नामांकन और जनसभा में जो भीड़ जुटी थी उससे तो यही लगता है कि कन्हैया भी कमज़ोर स्थिति में नहीं हैं?

हमारा मक़सद भाजपा को हराना है और हमलोग हराएंगे. हम सक्षम हैं. तनवीर हसन साहब वहां से चुनाव जीतने जा रहे हैं. हम सभा कर के आये थे. लोग एक पाँव पर खड़े हैं पार्टी को जिताने और लालू जी को न्याय दिलाने के लिए. जब सामाजिक न्याय, संविधान और भाईचारे पर ख़तरा होगा तो उस स्थिति में वहां की जनता जानती है कि सामाजिक न्याय की असली लड़ाई राजद ही लड़ती है.

चुनाव में महागठबंधन की लड़ाई नीतीश कुमार से है या नरेंद्र मोदी से?

आज नीतीश जी कोई फ़ैक्टर नहीं हैं. वे जहाँ हैं वहां की नाव भी डुबो देंगे. हमलोगों को इस बार भाजपा को जवाब देना है. एक भी वादा पूरा नहीं किया गया. इनको जनता अच्छी तरह से जवाब देगी.

अगर विपक्ष चुनाव में जीतता है तो पीएम कौन होग?

हमलोग तो कहीं रेस में हैं नहीं और न ही पलटू चाचा हैं. एक बात स्पष्ट है कि यह चुनाव किसी एक व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनाने का चुनाव नहीं है. देश को बचाने का चुनाव है. राहुल गांधी हमें बतौर पीएम स्वीकार्य हैं.

अदालत से ज़मानत की अर्ज़ीनामंज़ूर होने की वजह से 1977 के बाद पहली बार लालू प्रसाद की अनुपस्थिति में चुनाव हो रहा है. पार्टी और परिवार उनकी अनुपस्थिति कितना मिस कर रहा है?

यह सच है कि पिताजी हम लोगों से दूर हैं, लेकिन मैंने कई बार कहा है कि लालू प्रसाद सिर्फ़ एक नाम नहीं बल्कि विचारधारा हैं. उस विचार को मानने वाले लाखों- करोड़ों लोग हैं. लालू जी को वैसे सारे लोग जो सामाजिक न्याय और धर्म-निरपेक्षता में आस्था रखते हैं वो सब उन्हें चुनाव में मिस कर रहे हैं. यह बहुत महत्वपूर्ण चुनाव था. वो लोग जानते थे कि अगर लालू जी बाहर रहे तो उनका एजेंडा कामयाब नहीं हो पाएगा. संविधान और आरक्षण में छेड़छाड़ नहीं कर पाएंगे और न ही किसी दंगाई में हिम्मत होगा कि दंगा-फसाद करवा सके.

अदालत के फ़ैसले पर मैं कोई टिपण्णी नहीं कर सकता क्योंकि यह न्यायालय का विषय है, लेकिन मैं यह ज़रुर कहूँगा कि सबसे बड़ी अदालत जनता की होती है. लोगों ने मन बना रखा है लालू जी के साथ न्याय करने का. आने वाले दिनों में जो चुनाव का परिणाम आएगा उसमें आपको यह दिख जाएगा.

जिस तरह का व्यवहार उनके साथ किया जा रहा है उसको लेकर लोगों में नाराज़गी है. पिछले दिनों मुझे ही उनसे हॉस्पिटल में मिलने नहीं दिया गया. भाजपा सरकार का रवैया अमानवीय है. उन्हें उस ब्लॉक में रखा गया है जहाँ इलाज और जांच की व्यवस्था भी नहीं है. आप मुझसे उन्हें नहीं मिलने दो, लेकिन समुचित इलाज तो करो.

क्या परिवार में विरासत की लड़ाई छिड़ गई है?

यह कोई मुद्दा है नहीं है और यह किसी आम आदमी की ज़िंदगी की बेहतरी से भी जुड़ा नहीं है. घर की बात है, घर में ही रहनी चाहिए. चुनाव में नेता से लेकर कार्यकर्ताओं तक की भूमिका तय रहती है. मीसा भारती चुनाव लड़ रहीं हैं और तेजप्रताप चुनाव प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं.

महागठबंधन में सीट बंटवारा कितना तार्किक है?

ये सवाल हमलोगों के ख़ेमे से क्यों. आज यह बात हम नहीं कह सकते हैं. यह सवाल एनडीए के नेताओं से पूछना चाहिए. जब वहां सीट शेयरिंग की बात हो रही थी तो बिना रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को विश्वास में लिए हुए नीतीश जी और अमित शाह ने ख़ुद ही बराबर- बराबर सीटों का बंटवारा कर लिया. उसके बाद कौन कहाँ से लड़ेगा इसकी घोषणा अगले दो- तीन दिनों में करने की ख़बर आई. इस बात को दो- ढाई महीने हो गए होंगे. उसी बीच में चिराग़ पासवान को नीतीश जी ने ज़रिया बनवाया और ट्वीट के माध्यम से प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री से जनता द्वारा नोटबंदी के फायदे आदि सवाल करवाये. मतभेद वहां था हमारे यहाँ नहीं. अब चिराग़ पासवान बताएं कि नोटबंदी के क्या- क्या फायदे हुए हैं.

Wednesday, April 3, 2019

“月光族”成年轻消费者标签 “欠钱消费”时髦吗?

  不管是电话、邮件,还是朋友圈广告、传单,不管你在坐电梯、乘地铁、追剧,还是在打游戏、刷抖音……目之所及、耳之所闻,总有一个“窗口”、一个声音在问你:“要贷款吗?”

  打开手机App,各种“宝”、各种“贷”、各种“呗”总能占据排行榜C位,其触角甚至遍及所有家庭成员——线下对准退休的父母,线上对准还在上学的娃。各类“养生”“旅游”“医疗”等主题消费贷,某少儿英语、编程、体适能培训费分期,就连手机话费也有各种匹配的理财产品。

  一方面,银行、消费金融公司、网贷平台闻“利”而来,大举扩张;电子支付肆意拓土,渗透民生毛细血管。让生活更方便的同时,也放低了借钱的门槛。贷款人资质下降,以贷养贷、裸贷还债、信用贷集资,多头共债乱象丛生,累积的风险不容小觑。

  另一方面,社交媒体上,网红博主们花式炫富,炮制《“包”治百病》《不给你买YSL的男孩,不配说爱你》《心情三分靠打拼,七分靠shopping》等广告,用非常刺激、有诱惑性的词语来煽动人们的情绪,点燃人们的消费热情。

  电商巨头们也不遗余力地推波助澜。

  2016年,某购物平台在微博上喊出了“三观炸裂”的口号——“没有一个姑娘会因为买买买变穷,尤其是漂亮的姑娘。”

  2017年,某网贷平台推出广告,鼓舞年轻人通过消费贷款“活成自己想要的样子”,另一购物平台也用赤裸裸的广告词告诉我们有消费贷款的地方就有更好的生活。

  漫天的杠杆、热辣的推销、无尽的骚扰,在消费主义的煽风点火下,所有端口、所有平台、所有供给,对准你我的需求、你我的焦虑,火力全开、精准爆破。一些年轻人感慨,除了日常“剁手”,每月就是存款、银行卡、支付宝、微信钱包四大皆“空”,蚂蚁花呗、京东白条、苹果支付、银联闪付、银行信用卡五“账”俱全。

  在这个钱由“物”演进为“符号”的时代,在这个贷款前所未有便捷的时代,在这个“买买买即正义”的时代,超前消费不再是洪水猛兽,而是稀松平凡的日常。我们的消费欲望被无限地拉扯、放大,很容易就消费了自己根本负担不起的东西。

  “月光族”“花呗式青年”“无产中产阶层”“账单式小康”和“隐形贫困人口”成为当下消费者,尤其是年轻一代消费者的自嘲式标签。

  “现在到处都在宣传哪里可以借钱,但是借款人,尤其是年轻的借款人,行为是否理性?借了钱怎么用?有没有过度消费的情况?信用贷、现金贷的借贷群体,真的是生活必需到了不得不借的地步?”一位资深金融监管人员表示担忧,“前两天我的孩子无意中点开一个链接,就弹出来一句话,说是他中了20万元的贷款额度。问题是,对方怎么知道点开链接的人有借这么多钱的能力呢?”

  按照中国人民银行的数据,我国的个人消费贷款从2015年至2017年间迎来爆发式增长。同样,我国居民杠杆率也在2015至2017年间急速攀升。

  即便如此,也有人认为,不必过于担忧。因为我国“傲居全球”的居民储蓄率远高于一些发达国家,同样的居民杠杆率,由于较高的储蓄率,我国居民的偿债能力高得多。

  我国居民储蓄率曾高出美国一倍,但这种情形正在发生改变。过去,居民部门的金融需求相对单一,哪种金融工具安全可靠,人们就义无反顾地使用它。现在,居民部门的金融需求变得复杂,他们不再单纯追求金融资产的安全性,而是更加青睐甚至追逐金融资产的多元化和高收益,许多人迈进“欠钱”的门槛。

  中国人民银行数据计算显示,从2008年到2017年,我国储蓄率持续下降,并出现居民贷款增加额超过存款增加额的情况。据IMF预测,未来5年中国居民杠杆率将持续上升,2023年预计将达到61.3%,年均增长2个百分点。与此同时,储蓄率将下降。如果任由这一态势发展下去,无疑会增大未来我国居民债务的潜在风险。

  不可小看这些趴在银行账上的“储蓄存款”,它们不仅仅是广义货币、资金、金融资源之类的抽象词汇或者一组冰冷的数据,还承载着老百姓对改革进程、政府以及金融体系的信任,更牵系着千家万户的养老、教育、医疗等实实在在的民生环节。

  根据2018年中国统计年鉴数据,2017年我国主要城市住户存款余额中,北京以存款余额28962.2亿元排在首位,上海以24338.5亿元排第二,广州、重庆、成都、深圳紧随其后。这部分资金一旦“躁动”起来,会成为国内“游资”,形成多方面的金融冲击。在过去许多年,房地产市场、股票市场等都曾经成为其冲击的对象,造成了不小泡沫、风险甚至恐慌。

  欠钱,总是蕴含风险。至少在当前经济增速放缓之时,有关舆论不要一味为消费主义站台,不要一味宣扬储蓄率还高、居民杠杆率仍低的观点。而对于我们每一个人——剁手之时,必三思而行;欲加杠杆,量力而为。