Sunday, February 17, 2019

सऊदी अरब निवेश में भारत को तरजीह क्यों नहीं देता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद से भारत और खाड़ी देशों के साथ संबंध मज़बूत हुए हैं. सऊदी अरब ने भी दोस्ती में जोश भरने का फ़ैसला किया है.

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सऊद की 19 फ़रवरी से प्रस्तावित दो दिनों की भारत यात्रा इसी की एक झलक पेश करती है.

भारत और सऊदी अरब के बीच रिश्ते अच्छे ज़रूर हैं, लेकिन ये अभी ख़रीदार-विक्रेता की श्रेणी से आगे नहीं बढ़ पाए हैं.

भारत जितना कच्चा तेल आयात करता है उसका लगभग एक चौथाई हिस्सा सऊदी अरब से आता है. इसकी लागत साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा है.

अमरीका, चीन और संयुक्त अरब अमीरात के बाद सऊदी अरब भारत का चौथा सब से बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है.

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में खाड़ी देशों के विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा कहते हैं कि इस स्थिति में किसी बदलाव की सम्भावना नहीं हैं.

प्रोफ़ेसर आफ़ताब कमाल पाशा की राय में "ऐसा खाड़ी क्षेत्र में ईरान, यमन और क़तर की राजनीतिक स्थिति की वजह से है. सऊदी कोई बड़ा जोखिम उठाना नहीं चाहता."

वे कहते हैं, "राष्ट्रपति ट्रंप के जाने के बाद अगर अमरीका का सहयोग कम हो गया तो उनके पास पाकिस्तान को छोड़ कर कोई और देश नहीं है."

"इसलिए सऊदी अरब पाकिस्तान का दामन छोड़ना नहीं चाहता क्योंकि इस्लामाबाद से जिस तरह का मिलिट्री सपोर्ट रियाद को मिल सकता है वैसा भारत तो नहीं दे सकता."

परंपरागत रूप से सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच गहरी दोस्ती रही है. पाकिस्तान ने सऊदी अरब में संकट के समय उसे सैन्य सहयोग भी दिया है.

कश्मीर और अफ़ग़ानिस्तान के मामलों पर, सउदी अरब का झुकाव पाकिस्तान की तरफ़ ज़्यादा रहा है.

लेकिन हाल के सालों में सऊदी अरब ने एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की मान्यता को स्वीकार किया है. दोनों देश क़रीब आए हैं. आपसी व्यापार बढ़ रहा है.

हालांकि दोनों देशों के बीच का व्यापार संतुलन भारत के ख़िलाफ़ ही है.

सऊदी अरब ने साल 2010 में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सऊदी यात्रा के दौरान भारत में कई अरब डॉलर निवेश करने का वादा किया था.

लेकिन अब तक एक अरब डॉलर से भी कम निवेश हुआ है.

प्रोफ़ेसर पाशा कहते हैं, "भारत सऊदी अरब के लिए इतना आकर्षक नहीं है क्योंकि भारत उनसे ज़्यादा चीज़ें चाहता है."

"चाहे तेल हो या भारतीय श्रमिकों के लिए सऊदी में रोज़गार का मौका हो या फिर निवेश हो. जहाँ तक भारत का सवाल है उनके लिए सऊदी अरब उतना स्ट्रैटेजिक नहीं है जितना कि चीन, पाकिस्तान और अमरीका अहम है."

भारत को विदेशी निवेश की ज़रूरत ज़रूर है और दौलतमंद सऊदी अरब को बाज़ार चाहिए जो भारत के पास है भी, लेकिन सऊदी अरब ने अब तक निवेश में भारत को कोई बहुत ज़्यादा तरजीह नहीं दी है.

प्रोफ़ेसर पाशा की खाड़ी देशों पर दशकों से नज़र रही है. वो कहते हैं, "पाकिस्तान हो या भारत, मालदीव हो या मिस्र या फिर वो चाहे सूडान ही क्यों न हो..."

"इन देशों से सऊदी अरब ने जो इन्वेस्टमेंट के वादे किए हैं, वो अपने वादों का 10 से 15 फ़ीसदी हिस्सा ही पूरा कर पाया है."

"क्योंकि तेल का भाव उसकी उम्मीद के अनुसार 78 डॉलर प्रति बैरल तक नहीं पहुंच पाया और उसके घरेलू ख़र्चे बढ़ते जा रहे हैं."

वो आगे कहते हैं, "मेरे ख्याल से तो सऊदी अरब से बहुत कम निवेश यहां आया है. वे अभी अंदाज़ा लगा रहे हैं कि भारत के साथ संबंधों को कितनी गहराई तक ले जाना है."

भारत अगर पाकिस्तान की तुलना में सऊदी अरब के ज़्यादा नज़दीक जाना चाहता है तो उसे संकट की घड़ी में सऊदी अरब को सैन्य सहयोग का वादा करना होगा.

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